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गुडिया के साहस और सामाजिक परिवर्तन की कहानी

मेवानगर एक अति पिछड़ा और सामाजिक रूप से वंचित समुदाय बाहुल्य गाँव है, जहाँ परंपरागत सोच के कारण लड़कियों की शिक्षा को महत्व नहीं दिया जाता। पूरे गाँव में अब तक केवल एक लड़की ही ग्राम अध्यापिका बनी है। ऐसे माहौल में राइज फाउंडेशन ने समझ-बूझ के साथ गुडिया को प्रेरक के रूप में चयनित किया।

शुरुआत में गुडिया ने कहा, “यहाँ कोई भी लड़की पढ़ने के लिए तैयार नहीं होगी।”
लेकिन जब उसने सामुदायिक संगठन का प्रशिक्षण लिया, तो step-by-step कार्य शुरू किया और अपनी मेहनत, लगन और समर्पण से 39 शिक्षा से वंचित एवं संभावित शिक्षार्थियों की पहचान प्रोग्राम मेनेजर के साथ मिलकर कर ली।

सबसे बड़ी चुनौती, अभिभावकों की अनिच्छा: गाँव में अभिभावक लड़कियों की शिक्षा को महत्व नहीं देते थे। गुडिया ने हार नहीं मानी। वह घर-घर जाकर अभिभावकों से मिली, बातचीत की, समझाया, और समुदाय को राजस्थान स्टेट ओपन स्कूल तथा शिक्षा सेतु योजना के बारे में जागरूक किया। वह बताती है- “नामांकन के लिए राज़ी करवाना सबसे कठिन काम था।”

लेकिन जज़्बा नहीं टूटा: अधिकांश शिक्षार्थियों के पास नामांकन हेतु आवश्यक दस्तावेज़ नहीं थे। लेकिन गुडिया ने हार नहीं मानी। उसने हर शिक्षार्थी के लिए दस्तावेज़ जुटाने में पूरा संघर्ष किया और अंततः उनके प्रयासों से 27 लड़कियों का नामांकन करने में सफल रही।

गुडिया के प्रयास से गांव में पहली बार यह जागरूकता आई कि: लड़कियाँ भी सीधे 10वीं में ओपन बोर्ड से नामांकन ले सकती हैं, शिक्षा सेतु योजना उनके लिए एक बड़ा अवसर है, बिना स्कूल जाए भी वे अध्ययन कर सकती हैं, गाँव में शिक्षा के प्रति सकारात्मक माहौल बना है, और लड़कियों को दूसरी बार पढ़ाई करने की शुरुआत का अवसर मिला।

गुडिया का संदेश: “अगर हम मन में ठान लें, तो हर कार्य आसान हो सकता है। नामांकित सभी शिक्षार्थियों को 10वीं पास होते देखना ही मेरी सबसे बड़ी सफलता होगी।”

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